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प्यादों पर हुई कार्यवाही, सिंडिकेट के राजा-वजीर क्या होंगे बेनकाब ?


News Expert - Sushil Sharma 

हापुड़ - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गरीबों के लिए भेजा गया अनाज एक बार फिर कालाबाजारी की भेंट चढ़ गया। दो दिन पहले हापुड़ में इस गोरखधंधे का खुलासा हुआ, जब जांच में ट्रकों में भरे गेहूं-चावल की बोरियों पर पानी डाला जाना और कट्टों की अवैध बिक्री सामने आई।

संदिग्ध हालात में मिले आठ ट्रक

जानकारी के मुताबिक, 20 अगस्त को हापुड़ एफसीआई डिपो से गाजियाबाद के लिए 15 ट्रक अनाज रवाना किया गया था। लेकिन इनमें से आठ ट्रक हापुड़-मोदीनगर रोड पर चौधरी ढाबे के पास खड़े मिले। एडीएम, एसडीएम सदर, पूर्ति विभाग और पुलिस की टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच की। ट्रकों में गीले कट्टे और अधूरे दस्तावेज पाए गए। अगले दिन दोबारा तौल कराई गई तो कई ट्रकों का वजन भी मेल नहीं खा रहा था।

ड्राइवरों ने खोला राज

पूछताछ में ड्राइवरों ने माना कि कम मजदूरी मिलने के कारण वे ढाबा संचालकों को कुछ कट्टे बेच देते थे और वजन पूरा दिखाने के लिए बोरियों पर पानी डाल दिया जाता था। हालांकि, किसी ने लिखित बयान देने से इंकार कर दिया।

एफआईआर दर्ज

जिला विपणन अधिकारी की तहरीर पर पुलिस ने ट्रक चालक दिनेश, इंदजीत, विजेंद्र, प्रवीण, बिजेंद्र, नाजिम, आमिर और शहजाद समेत परिवहन कंपनी मैसर्स बुलंद लॉजिस्टिक्स और ढाबा संचालक हनी व सनी चौधरी पर आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है।

हालांकि सवाल यह है कि यह गोरखधंधा केवल ड्राइवरों और ढाबा मालिकों तक ही सीमित है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। सूत्रों की मानें तो ट्रकों में पानी डालकर वजन बढ़ाने और बोरियों की चोरी कोई छोटा खेल नहीं, बल्कि इसमें कई बड़े रसूखदारों की संलिप्तता की आशंका है।

सिंडिकेट के ‘मगरमच्छ’ अब भी आज़ाद

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि पकड़े गए ड्राइवर और हेल्पर तो केवल प्यादे हैं, जबकि असली “राजा” और “वजीर” अभी भी प्रशासन की पकड़ से बाहर हैं। रात तीन बजे से सुबह छह बजे तक चोरी का अनाज जनपद की कई फ्लोर मिलों में सप्लाई होता था। यह इतना बड़ा नेटवर्क है कि बिना बड़े आकाओं की शह के यह कारोबार संभव ही नहीं।

प्रशासन पर उठ रहे सवाल

कुछ माह पहले भी गेहूं पर पानी डालने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, लेकिन तब कड़ी कार्रवाई न होने से यह सिंडिकेट और मजबूत हो गया। अब सवाल यह है कि क्या इस बार केवल खानापूर्ति कर फाइलें बंद कर दी जाएंगी या फिर इस खेल के असली सरगनाओं को भी बेनकाब किया जाएगा।

अगर प्रशासन व एफसीआई सचमुच इस गोरखधंधे पर अंकुश लगाना चाहता है तो उसे केवल प्यादों पर नहीं बल्कि पूरे सिंडिकेट की जड़ों तक पहुंचना होगा। तभी गरीबों का हक़ बच पाएगा और कालाबाजारी की यह कड़ी टूट सकेगी।





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