News Expert - Sushil Sharma
हापुड़। देवनंदनी अस्पताल में सोमवार को उस समय हंगामा खड़ा हो गया जब चार दिन पहले जन्मे एक नवजात शिशु के परिजन चिल्लाने लगे कि उनका बच्चा मर चुका है, लेकिन अस्पताल प्रबंधन बिल बनाने के चक्कर में उसे वेंटिलेटर पर रखे हुए है। हंगामे की सूचना पर थाना देहात प्रभारी विजय गुप्ता पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और स्थिति को नियंत्रित किया।
जानकारी के अनुसार, चार दिन पहले जन्मा बच्चा बुखार और पीलिया की शिकायत पर परिजनों ने देवनंदनी अस्पताल में भर्ती कराया था। बच्चा गंभीर हालत में था, जिस पर उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। करीब 36 घंटे तक इलाज चलता रहा। इसी बीच परिजनों ने आरोप लगाया कि उनका बच्चा दम तोड़ चुका है, लेकिन अस्पताल द्वारा डेढ़ लाख रुपये का बिल बनाने के लिए बच्चे को वेंटिलेटर पर ही लिटा रखा गया है।
परिजनों का आरोप था कि डॉक्टर बच्चे से उन्हें मिलने भी नहीं दे रहे। हंगामे की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और बच्चे के पिता के साथ नवजात को देखने गई। पुलिस के अनुसार, बच्चा मूवमेंट कर रहा था और उसकी धड़कनें भी चल रही थीं। इसके बावजूद परिजन मानने को तैयार नहीं हुए और कहा कि बच्चा केवल मशीनों के सहारे चल रहा है।
परिजनों ने डॉक्टर से मांग की कि बच्चे को बिना मेडिकल सपोर्ट के दिखाया जाए। साथ ही कहा कि अगर बच्चा जीवित है तो वे उसका इलाज किसी अन्य डॉक्टर के यहां कराएंगे। इस पर अस्पताल प्रबंधन ने नवजात के डिस्चार्ज पेपर तैयार किए और 36 घंटे के इलाज का 16,800 रुपये का बिल बनाया। इसमें से परिजनों द्वारा जमा किए गए 10 हजार रुपये ले लिए गए और शेष 6,800 रुपये अस्पताल ने माफ कर दिए।
एंबुलेंस से बच्चे को शिफ्ट करने के दौरान परिजन फिर हंगामा करने लगे। उन्होंने अस्पताल से मांग की कि बच्चे की धड़कनें दिखाकर पुष्टि की जाए कि वह जिंदा है या नहीं। मौके पर ही जांच कराई गई, जिसमें बच्चे की धड़कनें चलती पाई गईं।
इसके बाद परिजन बच्चे को एंबुलेंस से डॉक्टर युनुस के पास ले गए। वहां डॉक्टर ने नवजात की धड़कनें और सांसें जांचीं और पिता को भी स्टेथोस्कोप के जरिए सुनवाईं। तब जाकर परिजनों को यकीन हुआ कि उनका बच्चा जीवित है। इसके बाद परिजन बच्चे को मेरठ के एक अस्पताल ले गए।
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि नवजात की हालत बेहद नाजुक थी। भर्ती से लेकर डिस्चार्ज तक उसका उपचार पूरी गंभीरता से किया गया। परिजनों द्वारा डेढ़ लाख रुपये के बिल की बात पूरी तरह झूठी है। अब तक कुल 16,800 रुपये का ही बिल बना, जिसमें से 6,800 रुपये माफ कर दिए गए हैं।













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