Top News

दो घोड़ों ने अपनी जान देकर ना जाने बचाई कितनी जानें


News Expert - Sushil Sharma 

हापुड़ - एक ओर जहां प्रचंड गर्मी से बेहाल लोग बारिश की बाट जोह रहे थे, वहीं मंगलवार को आई बारिश हापुड़ के लिए आफत बनकर आई। नगर में एक लापरवाह सिस्टम ने दो बेजुबान जानवरों की जान ले ली, और दर्जनों स्कूली बच्चों की जान बाल-बाल बची।

अपना घर कॉलोनी के बाहर जलभराव के बीच करंट उतरने से दो घोड़ों की दर्दनाक मौत हो गई। यह हादसा उस वक्त हुआ जब एसएसवी इंटर कॉलेज की छुट्टी होने पर सैकड़ों बच्चे उसी रास्ते से गुजर रहे थे।

पानी में छिपा मौत का करंट

बारिश के बाद अपना घर कॉलोनी के बाहर सड़क पूरी तरह जलमग्न हो गई थी। उसी जलभराव में एक लोहे का बिजली खंभा लंबे समय से एक पेड़ के सहारे झुका हुआ था। स्थानीय लोगों की मानें तो इस खंभे में करंट पहले से ही उतर रहा था, जिसकी कई बार विभाग को सूचना भी दी गई, लेकिन हर बार अनसुनी कर दी गई।

मंगलवार को जैसे ही दो घोड़े उस पानी में घुसे, जोरदार झटका लगा और दोनों वहीं तड़पते-तड़पते दम तोड़ बैठे। देखते ही देखते अफरा-तफरी मच गई। गनीमत रही कि घटनास्थल से ठीक पहले एसएसवी इंटर कॉलेज के सैकड़ों छात्र सड़क पार कर रहे थे। घोड़ों को तड़पते देख बच्चों और राहगीरों को करंट का आभास हुआ और उन्होंने फौरन खुद को पीछे खींच लिया।

दो घोड़ों ने बचाई न जाने कितनी जानें

स्थानीय लोगों ने कहा कि अगर घोड़े न होते तो शायद कोई बच्चा या राहगीर उस करंट की चपेट में आ जाता। ये बेजुबान जानवर जान देकर कई इंसानों की जान बचा गए। हादसे के बाद घटनास्थल पर सन्नाटा पसर गया, लेकिन प्रशासन का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा।


विभागीय लापरवाही की खुला खेल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि झुके हुए खंभे और उस पर टच होते बिजली के तारों की जानकारी कई बार विद्युत विभाग को दी गई थी। लेकिन विभाग ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

दोष साफ है – बारिश के पानी में करंट का उतरना, लटके हुए लोहे के खंभे पर बिजली के तारों का टच होना, और समय रहते कोई कार्यवाही न करना।

इस हादसे के बाद भी न तो बिजली विभाग का कोई अधिकारी मौके पर पहुंचा और न ही नगर पालिका ने कोई जवाबदेही तय की। उल्टा नगरपालिका की जेसीबी मशीन बुलवाकर दोनों घोड़ों के शवों को चुपचाप हटवा दिया गया, और हादसे को रफा-दफा करने की कोशिश की गई।

अगर जानवर की जगह इंसान होता तो?

अब बड़ा सवाल यही है कि अगर इन दो घोड़ों की जगह किसी इंसान की जान गई होती, तो क्या प्रशासन इसी तरह चुप रहता? क्या विभागीय अधिकारी तब भी आंखें मूंदे रहते?

घटना ने यह साफ कर दिया कि प्रशासन और विभागीय अमले की नजर में जानवरों की कोई कीमत नहीं है। लेकिन जनता यह सवाल जरूर पूछ रही है कि "क्या एक हादसे के इंतजार में बैठा है सिस्टम?"

स्थानीयों की मांग

दोषी अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई की जाए।

लोहे के खंभों की जांच कर सभी को ठीक किया जाए।

जलभराव वाले इलाकों में विद्युत सुरक्षा के विशेष इंतजाम हों।

जानवरों की मौत को भी गंभीरता से लेकर रिपोर्ट दर्ज हो।









Post a Comment

Previous Post Next Post